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रंगों की माया

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कभी कभी सोचता हूँ कि अगर दुनिया में रंग न होते तो दुनिया कैसी दिखती? शायद एकदम सफ़ेद या पूरी काली या शायद कुछ मटमैली सी? लेकिन सफ़ेद, काला या मटमैला भी तो एक रंग ही है। तो रंगविहीन दुनिया कैसी दिखती पानी के जैसी.. कांच के जैसी.. पारदर्शी? पेड़ पौधे, धरती, मकान, दुकान, इंसान... सभी कुछ कांच सा साफ़। आर पार दिखने वाला। जिस दुनिया में रंग न हो, जहाँ मकान तक पानी या कांच जैसे दिखे, जहाँ कपड़े भी आर पार दिखे तो हमारी वर्तमान दुनिया के आधे कार्य तो ऐसे ही व्यर्थ हो जाएंगे। जैसे फैशन के लिए होने वाले सारे काम व्यर्थ। चाहे कपड़े हो या मकानों का एक्स्टीरियर/इंटीरियर, सुरक्षा के लिए उनका उपयोग होगा लेकिन सिर्फ देखने के लिये कोई उपयोग नहीं। वास्तव में दृष्टि पर निर्भर पूरा बाज़ार ख़त्म हो जा येगा। क्योंकि जीवन की सारी दृश्य-सुन्दरता रंगों के कारण ही है। ये मेरे कपड़े, मेरे बेड की चादर, दीवारे, वार्डरोब, ये मेज, ये कुर्सी सभी कुछ रंगहीन हो जाय तो... मै कपड़े क्यों पहनूंगा, बेड पर चादर क्यों डालूँगा, वार्डरोब की क्या आवश्यकता होगी? यदि सभी कुछ पारदर्शी हो जाय तो मनुष्य की निजता से जुड़े सारे व्यवसाय ब...

धर्म

भारत के संविधान के अनुसार भारत एक धर्म निरपेक्ष देश है। धर्म निरपेक्ष के बजाय कुछ लोग पंथ निरपेक्ष शब्द का प्रयोग करते हैं। अंग्रेजी में यह सेक्युलर ही है। धर्म निरपेक्ष शब्द हो या पंथ निरपेक्ष। आशय यही है कि भारत राष्ट्र अपने नागरिकों में हिन्दू-मुस्लिम-बौद्ध-सिख-ईसाई-जैन-पारसी आदि के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा। क्या हिन्दू-इस्लाम-बौद्ध-सिख-ईसाई-जैन-पारसी-यहूदी आदि धर्म है अथवा पंथ? इसे जानने के लिए धर्म शब्द को समझना आवश्यक है। धर्म क्या है? धर्म से आशय क्या है? धर्म अर्थात क्या? क्या धर्म से आशय है कि मंदिर-मस्जिद-चर्च-गुरुद्वारा? क्या धर्म का अर्थ है पूजा-नमाज-प्रार्थना-ध्यान? क्या धर्म से आशय है जीवन पद्धति? क्या धर्म से आशय अपने आराध्य को मानने का ढंग है? क्या धर्म का अर्थ है किताब विशेष में लिखी हुई बातें?.... नहीं। ये सब धर्म की गलत व्याख्याएं हैं? धर्म का अर्थ है स्वभाव। धर्म का अर्थ है नैसर्गिक गुण। संसार मे प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक जीव का अपना अलग धर्म है। पानी का धर्म है बहना। गंध का धर्म है हवा में घुल जाना। आग का धर्म है जलाना। वृक्ष का धर्म है आकाश घेरना। पत्थर का ...

आओ बनाये एक राष्ट्र: बिना धर्म, बिना जाति

एक राष्ट्र का उसके नागरिक से क्या सम्बन्ध होना चाहिए? क्या राष्ट्र के लिए अपने नागरिक का जाति धर्म जानना आवश्यक है? क्या आज के समय में राष्ट्र के स्तर से जाति धर्म की कोई प्रासंगिकता बची है? एक नागरिक की राष्ट्र से क्या अपेक्षाएं हैं? बुनियादी ढांचा, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, रोजगार-व्यवसाय, सुरक्षा, कानून व्यवस्था | और एक राष्ट्र की अपने नागरिक से क्या अपेक्षाएं हैं? राष्ट्र की आय में भागीदारी, सौहार्दपूर्ण समाज की रचना, सामाजिक जिम्मेदारियों का निर्वहन, कानून व्यवस्था का पालन | क्या इन सबमें जाति धर्म की कहीं कोई आवश्यकता प्रतीत होती है? अगर कोई व्यक्ति हिन्दू है अथवा मुस्लिम है अथवा सिख है तो क्या राष्ट्र की उस व्यक्ति से अपेक्षाएं अलग अलग होंगी? राष्ट्र के लिए किसी व्यक्ति का सिर्फ नागरिक होना पर्याप्त नहीं? क्या राष्ट्र जाति धर्म से परे जाकर अपने नागरिक को सिर्फ नागरिक के रूप में देख पाने में सक्षम है? भारत में आज ऐसे राष्ट्र की कल्पना कर पाना भी असंभव प्रतीत होता है जहाँ किसी व्यक्ति की जाति अथवा धर्म का राष्ट्र की दृष्टि में कोई महत्व न हो | भारत भले ही संवैधानिक रूप ...

सनातन और धर्म

सनातन ही धर्म है। धर्म ही सनातन है। ये दो अलग अलग बातें नहीं है। ये एक ही बात को कहने के दो ढंग है। दो शब्द हैं। अर्थ एक ही है। दुर्भाग्य से तुमने धर्म के कुछ और ही अर्थ ले रखे हैं। तुम वाद को धर्म समझ बैठे हो। तुम्हारे सारे धर्म हिन्दू, ईसाई, इस्लाम, जैन सभी एक वाद से अधिक कुछ भी नहीं। तुमने कुछ निश्चित मान्यताओं को धर्म की संज्ञा दे रखी है। तुम्हारे सभी धर्म एक निर्दिष्ट मान्यता में बंधे हैं। वे दावा करते है मोह माया से मुक्ति का। लेकिन उन्होंने स्वयं धर्म का मायाजाल फैला रखा है। तुम इस तरह बंध चुके हो कि अपने दीवारों के बाहर झांकने में भी पापबोध महसूस करते हो। तुम्हारा बोध ही खो चुका है कि इन दीवारों के बाहर भी धर्म फैला हुआ है। तुम्हारा ये कैसा धर्म है जो तुम्हे भय से मुक्त करने की बजाय पाप का भय दिखा रहा है। ये कैसे धर्म हैं जो मुक्त करने के बजाय तुम्हे और भी सशक्त बंधन में बांधे जा रहे हैं। समाज और परिवार के बंधन शायद तुम तोड़ भी लो। धर्म के बंधन तोड़ने का तुम साहस भी नहीं कर पाते। अगर हिन्दू, मुस्लिम या ईसाई धर्म हैं तो अब धरती से धर्म को विदा करने का समय आ गया है। अब धरती ...

मंहगाई: कीमतें ज्यादा या आमदनी कम?

ज़िन्दगी में एक दौड़ है कमाई और खर्च के बीच। इस दौड़ में जब कमाई पीछे रह जाती है तो मंहगाई खलने लगती है। जब कमाई तेज दौड़ रही हो तो मंहगाई पर खयाल नहीं जाता। मंहगाई भी सापेक्षता का विषय है। कोई अनाज सब्जी को मंहगा बताता है तो कोई मौरंग ईंट को, कोई फल दूध को मंहगा बताता है तो कोई जमीन और सोने को। अम्बानी के स्तर पर जाकर देखेंगे तो वहां कुछ भी सस्ता या मंहगा नहीं है। वहां कीमतों में होने वाला प्रत्येक परिवर्तन एक अवसर है। वे उसमे भी व्यापार के अवसर तलाश लेते हैं। कीमतें बढ़ें या कम हो उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि उनकी कमाई कीमतों की दौड़ में बहुत आगे दौड़ रही है। मंहगाई से निपटने के लिए अभी तक अर्थशास्त्री उत्पादन बढ़ाने पर ज़ोर देते आये हैं। क्योंकि सीधा नियम है जब मांग की तुलना में उत्पादन बढ़ जाये तो कीमतें कम होनी चाहिए। लेकिन मैं इसमें एक और बात जोड़ता हूँ कि व्यक्ति की आय इतनी बढ़नी चाहिए कि उसे चीजे सस्ती लगने लगे। कम से कम, आवश्यक आवश्यकता की चीजें तो सस्ती लगने ही लगें। हालांकि मेरी बात अर्थशास्त्र के विपरीत लग सकती है। क्योंकि अर्थशास्त्र ये भी कहता है कि यदि आदमी के...

राजनीति: जीवन का गलत केंद्र

राजनीति हमारे समाज का केंद्र है। अखबारों में पहली खबर राजनीति की होती है। टी.वी. पर पहली खबर राजनीति की होती है। सामयिक विषय की पत्रिकाओं में 80 प्रतिशत लेख राजनीति पर होंगे। आप सुबह सोकर उठेंगे, अखबार उठाएंगे और आपके मन मे राजनीति शुरू हो गयी। अब तो आप अखबार उठाते ही इसलिए हो कि आपकी मन की राजनीति को कुछ खुराक मिले। क्योंकि पिछली रात आप टी.वी. पर राजनीति पर बहस देखते देखते ही सोए थे। आपको शायद पता नहीं लेकिन रात भर आपके मन मे यही राजनीति चलती रही। आप घर से निकल कर आफिस पहुंचे या दुकान पहुंचे वहां जैसे समय मिला, राजनीति पर ही आपकी चर्चा शुरू हो जाएगी। आप किसी के यहाँ पार्टी में जाएंगे वहां जैसे ही दो लोग अगर इकट्ठे हुए फिर राजनीति पर चर्चा शुरू। सुबह मॉर्निंग वॉक पर निकल जाइये वहां भी राजनीति पर चर्चा। आप मन्दिर मस्जिद में भी राजनीति नहीं छोड़ते। कोई जरा सा सुर छेड़ दे और वहां भी आपका राजनीतिक अलाप शुरू। मजे की बात यह है कि आप सोते जागते खाते पीते उठते बैठते राजनीति पर ही चर्चा करते हैं लेकिन उस चर्चा से हासिल कुछ नहीं होता। आप के जीवन मे उस चर्चा से कोई तरक्की नहीं हो रही। उल्...

नयी राजनीति

राजनीति समाज के श्रेष्ठतम व्यक्तियों का स्थान होना चाहिए। राजनीति ही सत्ता धारण करती है। देश की दिशा और दशा तय करती है। देश सही मार्ग पर चल सकता है यदि देश की राजनीति समाज के श्रेष्ठ व्यक्तियों के हाथ मे हो। लेकिन विडंबना ये है कि देश और समाज का निकृष्टम व्यक्ति आज राजनीति में है। जिसमे कोई रचनात्मकता नहीं है वो राजनीति में है। जिनकी महत्वाकांक्षाएं सघन है, जिनमे ताकत की भूख है वही राजनीति में आने को उत्सुक हैं। राजनीति करने का वेतन नहीं मिलता। परिणामस्वरूप जो भ्रष्टाचार से पैसे बनाने में योग्य है वही राजनीति के योग्य है। अगर तुम्हारा राजनीतिक ढांचा ही समाज के योग्य और श्रेष्ठ व्यक्ति को आने से रोकता है तो स्वाभाविक है कि राजनीति लोभी, भ्रष्टाचारी, अनैतिक, बेईमान लोगो से भर जाए। अभी तक राजनीति के स्याह पहलू आम समाज से छिपे रहते थे। लेकिन तकनीक के दौर में आज पूरा समाज जानता है कि हमारे नेता कितने ईमानदार, कितने नैतिक और कितने विचारधारा वादी है। सबसे प्रत्यक्ष उदाहरण अस्पष्ट बहुमत पर सरकार बनाते समय देखने को मिलते हैं। राजनीतिक दल अपने अपने सांसदों/विधायकों को छुपा देते हैं और ...