सनातन और धर्म
सनातन ही धर्म है। धर्म ही सनातन है। ये दो अलग अलग बातें नहीं है। ये एक ही बात को कहने के दो ढंग है। दो शब्द हैं। अर्थ एक ही है। दुर्भाग्य से तुमने धर्म के कुछ और ही अर्थ ले रखे हैं। तुम वाद को धर्म समझ बैठे हो। तुम्हारे सारे धर्म हिन्दू, ईसाई, इस्लाम, जैन सभी एक वाद से अधिक कुछ भी नहीं। तुमने कुछ निश्चित मान्यताओं को धर्म की संज्ञा दे रखी है। तुम्हारे सभी धर्म एक निर्दिष्ट मान्यता में बंधे हैं। वे दावा करते है मोह माया से मुक्ति का। लेकिन उन्होंने स्वयं धर्म का मायाजाल फैला रखा है। तुम इस तरह बंध चुके हो कि अपने दीवारों के बाहर झांकने में भी पापबोध महसूस करते हो। तुम्हारा बोध ही खो चुका है कि इन दीवारों के बाहर भी धर्म फैला हुआ है। तुम्हारा ये कैसा धर्म है जो तुम्हे भय से मुक्त करने की बजाय पाप का भय दिखा रहा है। ये कैसे धर्म हैं जो मुक्त करने के बजाय तुम्हे और भी सशक्त बंधन में बांधे जा रहे हैं। समाज और परिवार के बंधन शायद तुम तोड़ भी लो। धर्म के बंधन तोड़ने का तुम साहस भी नहीं कर पाते। अगर हिन्दू, मुस्लिम या ईसाई धर्म हैं तो अब धरती से धर्म को विदा करने का समय आ गया है। अब धरती ...