मंहगाई: कीमतें ज्यादा या आमदनी कम?
ज़िन्दगी में एक दौड़ है कमाई और खर्च के बीच। इस दौड़ में जब कमाई पीछे रह जाती है तो मंहगाई खलने लगती है। जब कमाई तेज दौड़ रही हो तो मंहगाई पर खयाल नहीं जाता। मंहगाई भी सापेक्षता का विषय है। कोई अनाज सब्जी को मंहगा बताता है तो कोई मौरंग ईंट को, कोई फल दूध को मंहगा बताता है तो कोई जमीन और सोने को। अम्बानी के स्तर पर जाकर देखेंगे तो वहां कुछ भी सस्ता या मंहगा नहीं है। वहां कीमतों में होने वाला प्रत्येक परिवर्तन एक अवसर है। वे उसमे भी व्यापार के अवसर तलाश लेते हैं। कीमतें बढ़ें या कम हो उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि उनकी कमाई कीमतों की दौड़ में बहुत आगे दौड़ रही है। मंहगाई से निपटने के लिए अभी तक अर्थशास्त्री उत्पादन बढ़ाने पर ज़ोर देते आये हैं। क्योंकि सीधा नियम है जब मांग की तुलना में उत्पादन बढ़ जाये तो कीमतें कम होनी चाहिए। लेकिन मैं इसमें एक और बात जोड़ता हूँ कि व्यक्ति की आय इतनी बढ़नी चाहिए कि उसे चीजे सस्ती लगने लगे। कम से कम, आवश्यक आवश्यकता की चीजें तो सस्ती लगने ही लगें। हालांकि मेरी बात अर्थशास्त्र के विपरीत लग सकती है। क्योंकि अर्थशास्त्र ये भी कहता है कि यदि आदमी के...