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Showing posts from May, 2018

मंहगाई: कीमतें ज्यादा या आमदनी कम?

ज़िन्दगी में एक दौड़ है कमाई और खर्च के बीच। इस दौड़ में जब कमाई पीछे रह जाती है तो मंहगाई खलने लगती है। जब कमाई तेज दौड़ रही हो तो मंहगाई पर खयाल नहीं जाता। मंहगाई भी सापेक्षता का विषय है। कोई अनाज सब्जी को मंहगा बताता है तो कोई मौरंग ईंट को, कोई फल दूध को मंहगा बताता है तो कोई जमीन और सोने को। अम्बानी के स्तर पर जाकर देखेंगे तो वहां कुछ भी सस्ता या मंहगा नहीं है। वहां कीमतों में होने वाला प्रत्येक परिवर्तन एक अवसर है। वे उसमे भी व्यापार के अवसर तलाश लेते हैं। कीमतें बढ़ें या कम हो उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि उनकी कमाई कीमतों की दौड़ में बहुत आगे दौड़ रही है। मंहगाई से निपटने के लिए अभी तक अर्थशास्त्री उत्पादन बढ़ाने पर ज़ोर देते आये हैं। क्योंकि सीधा नियम है जब मांग की तुलना में उत्पादन बढ़ जाये तो कीमतें कम होनी चाहिए। लेकिन मैं इसमें एक और बात जोड़ता हूँ कि व्यक्ति की आय इतनी बढ़नी चाहिए कि उसे चीजे सस्ती लगने लगे। कम से कम, आवश्यक आवश्यकता की चीजें तो सस्ती लगने ही लगें। हालांकि मेरी बात अर्थशास्त्र के विपरीत लग सकती है। क्योंकि अर्थशास्त्र ये भी कहता है कि यदि आदमी के...

राजनीति: जीवन का गलत केंद्र

राजनीति हमारे समाज का केंद्र है। अखबारों में पहली खबर राजनीति की होती है। टी.वी. पर पहली खबर राजनीति की होती है। सामयिक विषय की पत्रिकाओं में 80 प्रतिशत लेख राजनीति पर होंगे। आप सुबह सोकर उठेंगे, अखबार उठाएंगे और आपके मन मे राजनीति शुरू हो गयी। अब तो आप अखबार उठाते ही इसलिए हो कि आपकी मन की राजनीति को कुछ खुराक मिले। क्योंकि पिछली रात आप टी.वी. पर राजनीति पर बहस देखते देखते ही सोए थे। आपको शायद पता नहीं लेकिन रात भर आपके मन मे यही राजनीति चलती रही। आप घर से निकल कर आफिस पहुंचे या दुकान पहुंचे वहां जैसे समय मिला, राजनीति पर ही आपकी चर्चा शुरू हो जाएगी। आप किसी के यहाँ पार्टी में जाएंगे वहां जैसे ही दो लोग अगर इकट्ठे हुए फिर राजनीति पर चर्चा शुरू। सुबह मॉर्निंग वॉक पर निकल जाइये वहां भी राजनीति पर चर्चा। आप मन्दिर मस्जिद में भी राजनीति नहीं छोड़ते। कोई जरा सा सुर छेड़ दे और वहां भी आपका राजनीतिक अलाप शुरू। मजे की बात यह है कि आप सोते जागते खाते पीते उठते बैठते राजनीति पर ही चर्चा करते हैं लेकिन उस चर्चा से हासिल कुछ नहीं होता। आप के जीवन मे उस चर्चा से कोई तरक्की नहीं हो रही। उल्...

नयी राजनीति

राजनीति समाज के श्रेष्ठतम व्यक्तियों का स्थान होना चाहिए। राजनीति ही सत्ता धारण करती है। देश की दिशा और दशा तय करती है। देश सही मार्ग पर चल सकता है यदि देश की राजनीति समाज के श्रेष्ठ व्यक्तियों के हाथ मे हो। लेकिन विडंबना ये है कि देश और समाज का निकृष्टम व्यक्ति आज राजनीति में है। जिसमे कोई रचनात्मकता नहीं है वो राजनीति में है। जिनकी महत्वाकांक्षाएं सघन है, जिनमे ताकत की भूख है वही राजनीति में आने को उत्सुक हैं। राजनीति करने का वेतन नहीं मिलता। परिणामस्वरूप जो भ्रष्टाचार से पैसे बनाने में योग्य है वही राजनीति के योग्य है। अगर तुम्हारा राजनीतिक ढांचा ही समाज के योग्य और श्रेष्ठ व्यक्ति को आने से रोकता है तो स्वाभाविक है कि राजनीति लोभी, भ्रष्टाचारी, अनैतिक, बेईमान लोगो से भर जाए। अभी तक राजनीति के स्याह पहलू आम समाज से छिपे रहते थे। लेकिन तकनीक के दौर में आज पूरा समाज जानता है कि हमारे नेता कितने ईमानदार, कितने नैतिक और कितने विचारधारा वादी है। सबसे प्रत्यक्ष उदाहरण अस्पष्ट बहुमत पर सरकार बनाते समय देखने को मिलते हैं। राजनीतिक दल अपने अपने सांसदों/विधायकों को छुपा देते हैं और ...

प्रेम: कितना सच कितना फिल्मी

जन्म के बाद भाषा सीखते सीखते ही हम प्रेम, प्यार, लव, मोहब्बत जैसे शब्दों से भी परिचित हो चुके होते हैं | ज्यादातर तो दसवीं बारहवीं पास करते करते इन शब्दों पर पीएच.डी. भी कर चुके होते हैं | इसका पूरा श्रेय फिल्म उद्योग को जाता है | फिल्में छुटपन से ही कुछ बातें हमारे जेहन में भर देती हैं। जैसे हर किसी के लिए कोई न कोई बना है या प्यार तो पहली नज़र में हो जाता है या एक न एक बार सभी को किसी न किसी से सच्चा प्यार होता है या ऐसा ही और कुछ। ढेर सारे फिल्मी डायलॉग हैं जो अमूमन हर दूसरी तीसरी फिल्म में आपको मिल जाएंगे। फिल्में प्यार के सम्बंध में हमे जितना सिखा जाती हैं उतना हमे हमारे माता पिता या शिक्षक नहीं सीखा पाते। एक मायने में फिल्में हमारी 'लव गुरु' हैं। बच्चों की भी गलती नहीं, वे अपने आस पास इतना सब कुछ फिल्मी देखते हैं, उनके मन के गहरे बैठ जाता है कि ये सब सच है। वे हमें हमेशा फिल्मी गाने ही सुनते, गुनगुनाते देखते हैं। वे सभी महत्वपूर्ण अवसरों पर फिल्मी गीत बजते देखते हैं। फ़िल्म के अतिरिक्त संगीत का कोई और भी जगत है ये वे देर में समझ पाते हैं। अब तो बच्चे माँ बाप क...

फेसबुक और कर्म का सिद्धांत

आभासी ही सही लेकिन फेसबुक अपने आप में एक दुनिया है। और कमाल की बात ये है कि आपकी दुनिया का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत - कर्म का सिद्धांत यहां भी काम करता है। ऐसा यहां फेसबुक के परमात्मा यानी मार्क जुकरबर्ग के द्वारा किया जाता है। फेसबुक पर डाटा चोरी और प्राइवेसी में घुसने के आरोपों के चलते मार्क जुकरबर्ग को अमरीकी संसद में पेश होना पड़ा। वहां सांसदों ने उनसे तमाम सवाल किए। मार्क द्वारा दिये गए जवाबों से कुछ बातों की पुष्टि हुई है। मसलन फेसबुक सिर्फ आपकी फेसबुक ब्राउज़िंग की हिस्ट्री पर ही नज़र नहीं रखता। बल्कि वह आपके ब्राउज़र की टोटल ब्राउज़िंग हिस्ट्री पर नज़र रखता है। इसे समझिए, अगर आप अपने मोबाइल या लैपटॉप से फ्लिपकार्ट या अमेज़न पर जाकर कोई प्रोडक्ट सर्च करते हैं। तो फेसबुक पर आपको फ्लिपकार्ट या अमेज़न पर उसी प्रोडक्ट के आफर वाली पोस्ट मिलेंगी। क्योंकि फेसबुक आपके मोबाइल/लैपटॉप पर बिताए समय को जानता है। जब आप चुपचाप अकेले अपने मोबाइल लैपटॉप पर बिजी होते हैं तो कोई आप पर फिर भी नज़र रख रहा होता है। और वो है फेसबुक। अब बात फेसबुक के अंदर की। फेसबुक पर आपके सैकड़ो हज़ारो फ्रेंड (जानने वाले) ...