फेसबुक और कर्म का सिद्धांत

आभासी ही सही लेकिन फेसबुक अपने आप में एक दुनिया है। और कमाल की बात ये है कि आपकी दुनिया का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत - कर्म का सिद्धांत यहां भी काम करता है। ऐसा यहां फेसबुक के परमात्मा यानी मार्क जुकरबर्ग के द्वारा किया जाता है।

फेसबुक पर डाटा चोरी और प्राइवेसी में घुसने के आरोपों के चलते मार्क जुकरबर्ग को अमरीकी संसद में पेश होना पड़ा। वहां सांसदों ने उनसे तमाम सवाल किए। मार्क द्वारा दिये गए जवाबों से कुछ बातों की पुष्टि हुई है। मसलन फेसबुक सिर्फ आपकी फेसबुक ब्राउज़िंग की हिस्ट्री पर ही नज़र नहीं रखता। बल्कि वह आपके ब्राउज़र की टोटल ब्राउज़िंग हिस्ट्री पर नज़र रखता है।

इसे समझिए, अगर आप अपने मोबाइल या लैपटॉप से फ्लिपकार्ट या अमेज़न पर जाकर कोई प्रोडक्ट सर्च करते हैं। तो फेसबुक पर आपको फ्लिपकार्ट या अमेज़न पर उसी प्रोडक्ट के आफर वाली पोस्ट मिलेंगी। क्योंकि फेसबुक आपके मोबाइल/लैपटॉप पर बिताए समय को जानता है। जब आप चुपचाप अकेले अपने मोबाइल लैपटॉप पर बिजी होते हैं तो कोई आप पर फिर भी नज़र रख रहा होता है। और वो है फेसबुक।

अब बात फेसबुक के अंदर की। फेसबुक पर आपके सैकड़ो हज़ारो फ्रेंड (जानने वाले) हैं, जैसे बाहर की दुनिया में। अब सबकी पोस्ट आपके सामने लाने में जितना समय लगेगा उतनी देर आप फेसबुक पर टिकेंगे नहीं। और उतनी देर में उससे ज्यादा नई पोस्ट आ जायेंगीं। तो जब आप फेसबुक पर आते हैं तो फेसबुक चुनिंदा पोस्ट आपके सामने रखता है।

फेसबुक आपके लिए पोस्ट चुनता कैसे है। वह आपकी पसंद का हर वक्त खयाल रखता है। आपकी पोस्ट कितने लोगों को फेसबुक खोलते ही शुरुआत में दिखेगी यह काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है आप कितनी देर फेसबुक पर उपलब्ध रहते हैं। जैसे जो आदमी समाज मे ज्यादा सक्रिय है उसकी बात ज्यादा लोगो तक पहुंचती है।

आप किस फ्रेंड की पोस्ट ज्यादा लाइक, कमेंट और शेयर करते हैं उनकी पोस्ट आपको प्राथमिकता से परोसी जाती हैं। जैसे जिन लोगो के साथ आपकी पटरी खाये उनसे आप या वो आप से खुद चलकर मिल ही लेते हैं।

 फेसबुक आपको अलग अलग 'पेज' के वीडियो सजेस्ट करता है। आप किस एक पेज का एक बार वीडियो देख लीजिए फिर बार बार आपके सामने उसी पेज के वीडियो सजेस्ट किये जायेंगे।

फेसबुक 'पॉपुलर ऑन फेसबुक' बताता है आपने अगर उसे देखने मे रुचि ली तो बार बार आपको वैसे ही कंटेंट परोसे जाएंगे।

अब ध्यानपूर्वक कर्म का खेल समझिए। आप सोचते समय सोचते हैं कि सोचना एक नितांत एकांत की प्रक्रिया है इसे कोई नहीं देख रहा, लेकिन परमात्मा आपका सोचना भी देखता है, जानता है।

आप जैसा सोचते हैं, जैसा करते हैं, जैसा बोलते हैं, जैसे लोगों के साथ वक्त बिताते हैं, जैसा देखते हैं, आप स्वयं भी वैसे बन जाते हैं आप की दुनिया भी वैसी ही निर्मित हो जाती है।

ठीक इसी तरह आपकी फेसबुक की दुनिया भी निर्मित होती है। आप क्या देखते हैं, किससे बात करते हैं, किसे पसंद करते हैं वही बार बार आपके सामने आएंगे। और आपकी फेसबुक की दुनिया निर्मित करेंगे।

आप राजनीति में रुचि लेते हैं आप फेसबुक खोलेंगे तो सारी पोस्ट राजनीति से भरी पाएंगे। आप साहित्य में रुचि रखते हैं तो फेसबुक में साहित्य की प्रधानता पाएंगे। आप ऑनलाइन शॉपिंग के शौकीन है तो आपको फेसबुक पर तमाम चीजे बिकती मिलेंगी।

ये एक तरीका भी है स्वयं को परखने का। अगर आप के फेसबुक पर नफरत, अश्लीलता, ओछेपन की पोस्ट की भरमार है तो दुनिया को दोष मत दीजिये। ये आपके कर्मों (फेसबुक कर्म) का नतीजा है। फेसबुक पूरी तरह कर्म के सिद्धांत पर काम करता है।

जैसा कहते हैं न कि सोना जाने कसे, आदमी जाने बसे। अब आदमी को जानने का एक और उपाय है उसका फेसबुक।

...रजनीश "मैत्रेय"
मई 10, 2018

Comments

Popular posts from this blog

रंगों की माया

राजनीति: जीवन का गलत केंद्र

सनातन और धर्म