रंगों की माया
कभी कभी सोचता हूँ कि अगर दुनिया में रंग न होते तो दुनिया कैसी दिखती? शायद एकदम सफ़ेद या पूरी काली या शायद कुछ मटमैली सी? लेकिन सफ़ेद, काला या मटमैला भी तो एक रंग ही है। तो रंगविहीन दुनिया कैसी दिखती पानी के जैसी.. कांच के जैसी.. पारदर्शी? पेड़ पौधे, धरती, मकान, दुकान, इंसान... सभी कुछ कांच सा साफ़। आर पार दिखने वाला। जिस दुनिया में रंग न हो, जहाँ मकान तक पानी या कांच जैसे दिखे, जहाँ कपड़े भी आर पार दिखे तो हमारी वर्तमान दुनिया के आधे कार्य तो ऐसे ही व्यर्थ हो जाएंगे। जैसे फैशन के लिए होने वाले सारे काम व्यर्थ। चाहे कपड़े हो या मकानों का एक्स्टीरियर/इंटीरियर, सुरक्षा के लिए उनका उपयोग होगा लेकिन सिर्फ देखने के लिये कोई उपयोग नहीं। वास्तव में दृष्टि पर निर्भर पूरा बाज़ार ख़त्म हो जा येगा। क्योंकि जीवन की सारी दृश्य-सुन्दरता रंगों के कारण ही है। ये मेरे कपड़े, मेरे बेड की चादर, दीवारे, वार्डरोब, ये मेज, ये कुर्सी सभी कुछ रंगहीन हो जाय तो... मै कपड़े क्यों पहनूंगा, बेड पर चादर क्यों डालूँगा, वार्डरोब की क्या आवश्यकता होगी? यदि सभी कुछ पारदर्शी हो जाय तो मनुष्य की निजता से जुड़े सारे व्यवसाय ब...