आओ बनाये एक राष्ट्र: बिना धर्म, बिना जाति
एक राष्ट्र का उसके नागरिक से क्या सम्बन्ध होना चाहिए? क्या राष्ट्र के लिए अपने नागरिक का जाति धर्म जानना आवश्यक है? क्या आज के समय में राष्ट्र के स्तर से जाति धर्म की कोई प्रासंगिकता बची है? एक नागरिक की राष्ट्र से क्या अपेक्षाएं हैं? बुनियादी ढांचा, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, रोजगार-व्यवसाय, सुरक्षा, कानून व्यवस्था | और एक राष्ट्र की अपने नागरिक से क्या अपेक्षाएं हैं? राष्ट्र की आय में भागीदारी, सौहार्दपूर्ण समाज की रचना, सामाजिक जिम्मेदारियों का निर्वहन, कानून व्यवस्था का पालन | क्या इन सबमें जाति धर्म की कहीं कोई आवश्यकता प्रतीत होती है? अगर कोई व्यक्ति हिन्दू है अथवा मुस्लिम है अथवा सिख है तो क्या राष्ट्र की उस व्यक्ति से अपेक्षाएं अलग अलग होंगी? राष्ट्र के लिए किसी व्यक्ति का सिर्फ नागरिक होना पर्याप्त नहीं? क्या राष्ट्र जाति धर्म से परे जाकर अपने नागरिक को सिर्फ नागरिक के रूप में देख पाने में सक्षम है? भारत में आज ऐसे राष्ट्र की कल्पना कर पाना भी असंभव प्रतीत होता है जहाँ किसी व्यक्ति की जाति अथवा धर्म का राष्ट्र की दृष्टि में कोई महत्व न हो | भारत भले ही संवैधानिक रूप ...