प्रेम: कितना सच कितना फिल्मी
जन्म के बाद भाषा सीखते सीखते ही हम प्रेम, प्यार, लव, मोहब्बत जैसे शब्दों से भी परिचित हो चुके होते हैं | ज्यादातर तो दसवीं बारहवीं पास करते करते इन शब्दों पर पीएच.डी. भी कर चुके होते हैं | इसका पूरा श्रेय फिल्म उद्योग को जाता है |
फिल्में छुटपन से ही कुछ बातें हमारे जेहन में भर देती हैं। जैसे हर किसी के लिए कोई न कोई बना है या प्यार तो पहली नज़र में हो जाता है या एक न एक बार सभी को किसी न किसी से सच्चा प्यार होता है या ऐसा ही और कुछ। ढेर सारे फिल्मी डायलॉग हैं जो अमूमन हर दूसरी तीसरी फिल्म में आपको मिल जाएंगे। फिल्में प्यार के सम्बंध में हमे जितना सिखा जाती हैं उतना हमे हमारे माता पिता या शिक्षक नहीं सीखा पाते। एक मायने में फिल्में हमारी 'लव गुरु' हैं।
बच्चों की भी गलती नहीं, वे अपने आस पास इतना सब कुछ फिल्मी देखते हैं, उनके मन के गहरे बैठ जाता है कि ये सब सच है। वे हमें हमेशा फिल्मी गाने ही सुनते, गुनगुनाते देखते हैं। वे सभी महत्वपूर्ण अवसरों पर फिल्मी गीत बजते देखते हैं। फ़िल्म के अतिरिक्त संगीत का कोई और भी जगत है ये वे देर में समझ पाते हैं। अब तो बच्चे माँ बाप को घर मे गाहे बगाहे 'आई लव यू' भी बोलते सुन लेते हैं। ये बात दीगर है कि वे माँ बाप के रिश्तों में प्रेम की उपस्थिति का एहसास शायद ही कभी कर पाते हो।
हमारी बाजारें भी फिल्मों के प्रभाव से पटी पड़ी हैं। फैशन और सौंदर्य प्रसाधन की छोड़िए, खाद्य सामग्री, वाहन आदि सभी क्षेत्र फिल्मों से कहीं न कहीं प्रभावित हैं।
फिल्में सिर्फ प्रेमी-प्रेमिका या पति-पत्नी के बीच प्यार को ही नहीं परिभाषित करती बल्कि वे माता पिता, भाई बहन, दोस्त, आदि के प्यार को भी परिभाषित करती हैं। आज की दुनियां में प्यार के सम्बंध में ढेर सारे उसूल, नियम, तौर तरीके, सही गलत को फिल्में ही निर्धारित कर रही हैं।
प्यार के सम्बंध में, फिल्में हमारे मस्तिष्कों में एक ऐसा माहौल रच देती हैं कि प्यार की हमारी सारी व्याख्याएं फ़िल्म आधारित हो जाती हैं। हम अपने निजी सम्बन्धो को भी उसी फिल्मी प्रेम की कसौटी पर परखने लगते हैं। और यहीं हम जीवन के सम्बन्ध में सबसे बड़ी भूल करने लगते हैं।
जिन सम्बन्धो में हम प्रेम के दावे करते हैं, उन सम्बन्धों में हमारे झगड़े भी होते हैं। ईमानदारी पूर्वक बात करें तो जिस सम्बन्ध में प्रेम की उपस्थिति है वहां से झगड़े विदा हो जाने चाहिए। परन्तु ऐसा होता नहीं। और हम अपने झगड़ों के पक्ष में भी तर्क तैयार कर लेते हैं। हम कहते हैं कि झगड़े तो प्रेम की निशानी है। शायराना अंदाज़ में हम अपने झगड़े को भी खूबसूरती से बयां करना सीख जाते हैं जैसे "ज़रा सी बात का इतना मलाल करते हो, शिकायते भी वहां है मोहब्बत जहां है।"
थोड़ा ध्यानपूर्वक देखिये, हमारे आस पास प्रेम के जितने दावे किए जा रहे हैं, उसके हिसाब से हमारा पूरा जीवन, हमारा पूरा समाज प्रेम से भर जाना चाहिए था। लेकिन प्रेम की सुगंध कहीं महसूस नहीं होती। माँ-बाप और संतानों में प्रेम गायब है, पति पत्नी में प्रेम गायब है। मित्रों, पड़ोसियों, रिश्तेदारों सब तरफ नज़र डालिये, आपको कहीं भी प्रेम की अनुभूति नहीं होगी। क्या कारण है कि प्रेम के दावे तो सब तरफ हैं लेकिन प्रेम कहीं नहीं। प्रेम के विषय मे कहीं हम चूक तो नहीं रहे।
निश्चित ही हम चूक रहें हैं। प्रेम के नाम पर चारों तरफ जो दिख रहा है उसमे प्रेम कहीं नहीं है। प्रेम के सभी दावों का प्रेम से कोई सरोकार ही नहीं है। प्रेम जब होता है तो दावा करने की जगह नहीं बचती। लेकिन वास्तविकता में यहां प्रेम के दावे के पीछे कुछ और है। पति पत्नी एक दूसरे के मालिक बन जाने की कोशिश में हैं। पति पत्नी में कोई भी एक दूसरे के समक्ष समर्पण करना नहीं चाहता। दोनो ही चाहते हैं कि दूसरा मेरे हिसाब से चले, मेरे नियमों में बंधे। दोनो ही एक दूसरे को अपने जैसा बना देने में लगे हुए हैं। जबकि अगर किसी एक का प्रेम सच्चा है तो उसे दूसरे के प्रति पूरी तरह समर्पित हो जाना चाहिए। इस तरह समर्पित कि दोनों एक हो जाएं। लेकिन दोनों ही चाहते हैं कि दूसरा मेरे प्रति समर्पित हो जाये। स्वयं कोई समर्पित नहीं होना चाहता।
पिता पुत्र को वह बनाना चाहता है जो वह स्वयं नहीं हो पाया। पत्नी पति को वैसा कर देना चाहती है जो उसकी दृष्टि में उचित है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी सोच, अपने विचार, अपनी समझ के दायरे में दूसरे को ले आना चाहता है। प्रतिपल यही कोशिश है कि सामने वाला वही सोचे, वह बोले जो मेरी परिभाषा में ठीक है। पुत्र हो, पत्नी हो, मित्र हो सब मेरा ही विस्तार हो जाएं।
दरअसल ये तुम्हारे अहंकार का विस्तार है। तुम प्रेम के नाम पर भी अपने अहंकार को पोष रहे हो। तुम प्रेम का दावा करके अपने अहंकार को ही बढ़ाने में लगे हुए हो।
प्रेम के विषय मे तुम्हारी सारी धारणाएं खोखली हैं। प्रेम के तुम्हारे अनुभव शून्य हैं। तुम्हे प्रेम की फिल्मी अवधारणा को विसर्जित करना होगा। बल्कि प्रेम की सभी धारणाओं को विसर्जित करना होगा। धारणाओं अवधारणाओं से प्रेम चूकने ही वाला है। प्रेम उधार की धारणाओं से नहीं आएगा, प्रेम मान्यताओं में नहीं समायेगा, प्रेम सम्बन्धो से नहीं परिभाषित हो सकेगा। प्रेम को जीवन मे लाने का एक ही उपाय है... अहंकार का विसर्जन। जैसे जैसे तुम्हारा अहंकार विसर्जित होगा, तुम्हारे जीवन मे प्रेम की सुगंध उठनी शुरू हो जाएगी। और जब तक अहंकार है प्रेम हो ही नहीं सकता। तुम्हारे प्रेम के सारे दावे झूठ हैं। जब प्रेम होगा तब तुम्हे दावे की आवश्यकता भी न रह जाएगी।
This comment has been removed by the author.
ReplyDelete
ReplyDeleteजीवन में हमने कई तरह के संबंध बनाते हैं, जैसे पारिवारिक संबंध, वैवाहिक संबंध, व्यापारिक संबंध, सामाजिक संबंध आदि। ये संबंध हमारे जीवन की बहुत सारी जरूरतों को पूरा करते हैं। ऐसा नहीं है कि इन संबंधों में प्रेम जताया नहीं जाता या होता ही नहीं। बिलकुल होता है। आप हर काम प्रेमपूर्वक कर सकते हैं। परंतु यह फिल्मी प्रेम से भिन्न है।
एक बार मेरे कई सहकर्मी, बैठ कर खुशी और आस्क्ति पर वाद-विवाद कर रहे थे। मुझे आता देख कर एक सहकर्मी पूछता है कि मैंम, बताइए खुशी क्या है? आपको एक मरसमर्सि बेंज कार और एक आलीशान बंगला मिल जाए तो आप बहुत खुश होंगी??
मैंने जवाब दिया कि मर्सीडीज बेंज कार और आलीशान बंगला तो मैं भी आज नहीं तो कल खरीद लूंगी पर पर उस कार और बंगले में साथ कौन-कौन हैं, खुशी इस पर निर्भर करती है। कार और बंगला खुशी नहीं सोची समझी आस्क्ति है जिसे अंग्रेजी भाषा में specific desire कहते हैं।
आधुनिक काल में खुशी को पैसों का और प्रेम को आस्क्ति का पर्याय समझा जाने लगा है। सही मायनों में दोनों को ही अर्थ पाना नहीं, न्योछावर करना है।
पाश्चात्य संस्कृति के वैलेंटाइन डे, मदर्स डे और फ़ादर्स डे सिर्फ औपचारिकता ही है फिल्मी प्रेम भी असली प्रेम और खुशी से भिन्न हैं।