राजनीति: जीवन का गलत केंद्र

राजनीति हमारे समाज का केंद्र है। अखबारों में पहली खबर राजनीति की होती है। टी.वी. पर पहली खबर राजनीति की होती है। सामयिक विषय की पत्रिकाओं में 80 प्रतिशत लेख राजनीति पर होंगे। आप सुबह सोकर उठेंगे, अखबार उठाएंगे और आपके मन मे राजनीति शुरू हो गयी। अब तो आप अखबार उठाते ही इसलिए हो कि आपकी मन की राजनीति को कुछ खुराक मिले। क्योंकि पिछली रात आप टी.वी. पर राजनीति पर बहस देखते देखते ही सोए थे। आपको शायद पता नहीं लेकिन रात भर आपके मन मे यही राजनीति चलती रही।

आप घर से निकल कर आफिस पहुंचे या दुकान पहुंचे वहां जैसे समय मिला, राजनीति पर ही आपकी चर्चा शुरू हो जाएगी। आप किसी के यहाँ पार्टी में जाएंगे वहां जैसे ही दो लोग अगर इकट्ठे हुए फिर राजनीति पर चर्चा शुरू। सुबह मॉर्निंग वॉक पर निकल जाइये वहां भी राजनीति पर चर्चा। आप मन्दिर मस्जिद में भी राजनीति नहीं छोड़ते। कोई जरा सा सुर छेड़ दे और वहां भी आपका राजनीतिक अलाप शुरू।

मजे की बात यह है कि आप सोते जागते खाते पीते उठते बैठते राजनीति पर ही चर्चा करते हैं लेकिन उस चर्चा से हासिल कुछ नहीं होता। आप के जीवन मे उस चर्चा से कोई तरक्की नहीं हो रही। उल्टे थोड़ा ध्यान देंगे तो पाएंगे इस राजनीति ने आपका जीवन और नरक कर रखा है। आपसे ज्यादा तो वो चंद लोग सुखी हैं जिन्हें आप कुछ समझते नहीं क्योंकि वे राजनीति पर चर्चा नहीं करते।

हमनें राजनीति को अनावश्यक रूप से जीवन मे इतनी प्रमुखता दे रखी है। मानों राजनीति पर नज़र न रखी तो जीवन मे कुछ महत्वपूर्ण चूक जाएगा। वास्तविकता में राजनीति को आपने इतनी प्रमुखता दे रखी है कि जीवन मे तमाम प्रमुख चीजे छूटी जा रही हैं। जीवन मे राजनीति के अतिरक्त भी चीजे हैं कला है, खेल है, संगीत है, विज्ञान है, धर्म है, संस्कृति है। तमाम चीजे हैं जिन को आप समय देकर जीवन को ज्यादा सुंदर और लयबद्ध ढंग से जी सकते हैं। लेकिन राजनीति जैसी चीज को अनावश्यक महत्व देकर आपने अपना जीवन कुरूप कर लिया है। 

राजनीति पर हमने इतना ध्यान दिया है कि हमारा पूरा व्यक्तित्व राजनैतिक हो गया है। हम कुछ भी कर रहे हों, हमारे व्यक्तित्व के केंद्र में राजनीति हो गयी है। हमारे सोचने का ढंग राजनैतिक हो गया है। कभी सोचा है कि हम सीख क्या रहे हैं राजनीति से? राजनीति कैसे तुम्हे प्रभावित कर रही है? राजनीति समूचे समाज के मन मस्तिष्क में इस तरह से रच बस गयी है कि हमारे जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी इसी का प्रभाव दिखने लगा है।

आप नौकरी करते हैं वहां भी राजनीति, आप व्यवसाय करें वहां भी राजनीति, कला हो, खेल हो, संगीत हो हर क्षेत्र में राजनीति। और राजनीति इतनी हावी कि तुम प्रतिभाओं का चयन भी वोट के आधार पर करने लगे। 

राजनीति प्रतिद्वंदिता सिखाती है, ये महत्वाकांक्षियों का जगत है, यहाँ आगे निकलने की होड़ है, यहाँ किसी भी प्रकार से ताकत पा लेने की अभिलाषा है। तुमने देखा कि सदियों से राजनीति पर ध्यान दे देकर तुमने यहीं गुण अपने चित्त में स्थायी कर लिए। अब सभी दिशाओं में, समाज के प्रत्येक क्षेत्र में इन्हीं गुणों की प्रधानता है। खिलाड़ी, संगीतज्ञ, गायक, चित्रकार, वैज्ञानिक, धर्मगुरु, चिंतक, व्यवसायी, पेशेवर सभी प्रतिद्वंदिता कर रहे हैं, महत्वाकांक्षा से भरे हैं, आगे निकलने के लिए, जीतने के लिए, ताकत हासिल करने के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार हैं। क्योंकि सबको यही लगता है कि इसमें कुछ गलत नहीं है। सुबह से शाम अपने चारों तरफ वे ऐसा ही होता देख रहे हैं। हम इतने असंवेदनशील हो गए हैं कि किसी को धक्का देकर आगे निकल जाने में कुछ गलत महसूस नहीं करते।

राजनीति पर ध्यान देते देते हम सब राजनैतिक चित्त से भर चुके हैं। हमारे जीवन मे राजनीति इतनी महत्वपूर्ण हो गयी है कि आप गौर करिये, आपके जीवन मे जो भी थोड़ी भौतिक प्रगति प्राप्त कर लेता है, जैसे ही व्यक्ति अपने क्षेत्र में उचाईयों पर पहुंचने लगता है वह राजनीति के क्षेत्र में अपनी जगह तलाशने लगता है। आप बड़े व्यवसायी हो गए, आप बड़े वकील हो गए, आप बड़े कवि हो गए कि आप दौड़ पड़े राजनीति की तरफ। आप लग गए कोशिश में कि विधायकी, सांसदी का टिकट मिल जाये। 

और जो नहीं आते राजनीति में, उन्हें राजनीति खुद आग्रह कर ले आती है। आपका कद राजनीति से बड़ा हो जाये तो राजनीति आपको राज्यसभा भेज देगी। आप राजनीति से बचोगे तो भी उपयोग कर लिए जाओगे। ऐसा लगता है मानों मनुष्य का जन्म ही राजनीति के लिए हुआ हो। संसद पहुंच गए कि मिला मोक्ष।

कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि समाज मे आप को चारो तरफ धक्कामुक्की, टांग खिंचाई, भ्रष्टाचार, बेईमानी, धूर्तता नज़र आती है। आपके समाज की जड़ों में राजनीति है। अखबार और टी.वी. ऐसे लोगो की चर्चाओं से भरे हैं जो बात करने लायक नहीं। इसका नतीजा यह होता है कि ध्यान पाने के इच्छुक लोग राजनीति को ओर आकृष्ट हो जाते हैं। और वे कुछ भी उल्टा सीधा करेंगे कि टी.वी. पर उनका चेहरा दिख जाए, अखबार में उनकी फोटो छप जाए। फ़ोटो न सही नाम ही छप जाए। इसके लिए वे धरना प्रदर्शन करेंगे, रोड जाम करेंगे, तोड़ फोड़ करेंगे, कुछ उछल कूद करेंगे कि वे चर्चा का केंद्र बने। और तुम समझते हो वे तुम्हारी समस्याओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। नहीं उन्हें तुम्हारी समस्याओं से कोई सरोकार नहीं। वे तुम्हारी समस्या को अवसर बना के उपयोग कर रहे हैं। उन्हें टी.वी., अखबार में आना है। उन्हें समाज का ध्यान पाना है। और इसके लिए वे तुम्हारा उपयोग करेंगे। तुम्हारी कोई समस्या न हुई तो वे सुलझाने के लिए नई समस्या पैदा भी कर सकते हैं। और वे कर ही रहे हैं। वे नई समस्या पैदा ही कर रहे हैं रोज रोज। ताकि उसे सुलझाने के नाम पर अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति कर सकें। समस्याए मूलतः इतनी हैं नही जितने तुम्हारे नेता सुलझाने में लगे हैं। जब भी लगे समाज मे बहुत समस्याएं हैं, एक सप्ताह के लिए प्रयोग करके देखो। टी.वी., अखबार, मोबाइल एक सप्ताह के लिए बंद कर दो। तुम्हारी 90 प्रतिशत समस्याए खत्म हो जाएंगी।

आप इस समाज को बदलना चाहते हो तो राजनीति को अखबार के भीतरी पन्नों में जगह देनी होगी। आप मनुष्य के जीवन से ज़हर कम करना चाहते हो तो टी.वी. पर राजनीतिक समाचारों का समय कम करना होगा। आप समाज मे प्रेम, सहयोग, न्याय की अपेक्षा करते हो तो समाज की जड़ों को राजनीति से मुक्त करना होगा।

कुछ वर्षों के लिए हमे एक प्रयोग करना चाहिए। हमें अखबारों के पहले पन्ने पर राजनीति की कोई खबर नहीं रखनी चाहिए। बल्कि पहले पन्ने पर कोई भी नकारात्मक समाचार नहीं रखना चाहिए। पहले पन्ने को सकारात्मक, रचनात्मक खबरों के लिए रखना चाहिए। इसमें वैज्ञानिक उपलब्धियां हो, समस्याओं के समाधानों की खबरे हों, धर्म अध्यात्म पर लेख हो। काव्य हो, साहित्य हो, संगीत की, खेल की खबर हो। और राजनीतिक खबर को अंदर के पन्नो पर रखा जाय। इसके दो फायदे होंगे एक तो सुबह उठते ही आपका चित्त सकारात्मक ऊर्जा से भरेगा। आपको लगेगा कि हाँ दुनियां में कुछ अच्छा भी हो रहा है। आपके जीवन मे सृजनात्मक विषयों पर चर्चा शुरू हो सकेगी। और दूसरा फायदा यह कि सिर्फ ध्यान आकृष्ट कर अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति करने वाले लोग हतोत्साहित होंगे। फिर शायद राजनीति में इतना कचरा न भरने पाए। टी.वी. पर भी समाचारों की शुरुआत ऐसे ही समाचारों से की जाय। राजनीति का स्थान बाद में रखा जाय। वो भी थोड़ी देर के लिए। टी.वी. चैनल्स को अपने प्राइम टाइम में सप्ताह में एक दिन राजनीति का विषय रखें। बाकी दिन खेल, संगीत, साहित्य, विज्ञान, मनोरंजन, अध्यात्म आदि के लिए चर्चा रखे। 
जब हम सोते समय कोई सृजनात्मक चर्चा करेंगे, सोकर उठने पर कोई सकारात्मक खबर पढ़ेंगे, महफिलों में ध्यान अध्यात्म पर चर्चा करेंगे तो निश्चय ही हम एक बेहतर समाज का निर्माण कर सकेंगे।

Comments

  1. Clear thoughts but who will take the lead to change current environment, perhaps nobody. As we all want to know truth but never believe nor practice it. Only good thoughts will do nothing.

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    1. आइए हम स्वयं से शुरुआत करें। हम निर्णय ले हम सकारात्मक रहेंगे और तटस्थ दृष्टि रखेंगे।

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