धर्म

भारत के संविधान के अनुसार भारत एक धर्म निरपेक्ष देश है। धर्म निरपेक्ष के बजाय कुछ लोग पंथ निरपेक्ष शब्द का प्रयोग करते हैं। अंग्रेजी में यह सेक्युलर ही है। धर्म निरपेक्ष शब्द हो या पंथ निरपेक्ष। आशय यही है कि भारत राष्ट्र अपने नागरिकों में हिन्दू-मुस्लिम-बौद्ध-सिख-ईसाई-जैन-पारसी आदि के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा।

क्या हिन्दू-इस्लाम-बौद्ध-सिख-ईसाई-जैन-पारसी-यहूदी आदि धर्म है अथवा पंथ? इसे जानने के लिए धर्म शब्द को समझना आवश्यक है।

धर्म क्या है? धर्म से आशय क्या है? धर्म अर्थात क्या? क्या धर्म से आशय है कि मंदिर-मस्जिद-चर्च-गुरुद्वारा? क्या धर्म का अर्थ है पूजा-नमाज-प्रार्थना-ध्यान? क्या धर्म से आशय है जीवन पद्धति? क्या धर्म से आशय अपने आराध्य को मानने का ढंग है? क्या धर्म का अर्थ है किताब विशेष में लिखी हुई बातें?.... नहीं। ये सब धर्म की गलत व्याख्याएं हैं?

धर्म का अर्थ है स्वभाव। धर्म का अर्थ है नैसर्गिक गुण। संसार मे प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक जीव का अपना अलग धर्म है। पानी का धर्म है बहना। गंध का धर्म है हवा में घुल जाना। आग का धर्म है जलाना। वृक्ष का धर्म है आकाश घेरना। पत्थर का धर्म है धरती से जुड़े रहना। मछली का धर्म है पानी मे रहना। चिड़िया का धर्म है आकाश में विचरण करना। और ये सब इनके एकमात्र धर्म नहीं है। ये सारे उदाहरण इन सबके कुल धर्म का एक हिस्सा भर हैं। जो भी जिसका मूल स्वभाव है वही उसका धर्म है।

इस दुनिया मे मनुष्य को छोड़कर लगभग प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक जीव करीब करीब धार्मिक है। पूरी धरती से यदि मनुष्यो को हटा दिया जाय तो समूची धरती पूर्ण धार्मिक है। केवल मनुष्य एक ऐसा प्राणी है जो धार्मिक होने का दावा करता है, या धर्म को खोजता फिरता है, और फिर भी सबसे ज्यादा अधार्मिक है। धरती की प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक जीव इतनी सरल और सहज है कि वह अपने स्वभाव में ही है। लेकिन मनुष्य अपना चित्त बेहद जटिल बना चुका है, कामनाओं से भर चुका है। अब मनुष्य में न सरलता बची है न सहजता। अब उसे अपना धर्म ढूंढना पड़ता है। जो सरल है, सहज है वही धर्म है।

क्या मनुष्य के एक से अधिक धर्म हो सकते हैं? क्या संसार मे किसी भी सजातीय के एक से अधिक धर्म हो सकते हैं? यदि आप धर्म को समझते हैं तो आप जानते हैं कि मनुष्य का एक ही धर्म हो सकता है। और वह धर्म मनुष्य को सहज और सरल होकर ही मिल सकता है। लेकिन फिर भी मनुष्यो की इस दुनिया मे इतने धर्म कैसे पैदा हो गए?

मनुष्य के अस्तित्व की दृष्टि से पृथ्वी बहुत विशाल है। और फिर मनुष्यों ने विकास भी बहुत किया। भाषाएं विकसित कर ली। वस्त्र विकसित कर लिए। धन और संपत्ति जैसी अवधारणाएं विकसित कर ली। राष्ट्र की अवधारणा विकसित कर ली। और इन तमाम विकासों ने मनुष्यो में वर्ग और भेद विकसित कर दिए। मनुष्य ने अपनी विकास यात्रा में अपना सहज और सरल स्वभाव खो दिया।

और फिर इतिहास में अलग अलग क्षेत्रो में समय समय पर कुछ लोग जन्म लेते हैं जिन्हें मनुष्य के इस स्वभाव का पता चलता है। वह अन्य लोगों को भी इसी स्वभाव को प्राप्त करने की शिक्षा देते हैं। और वह एक अन्य आयाम का रहस्योद्घाटन करते हैं। वे सृष्टि के कुछ मूलभूत तत्वों के साथ आपके एकीकृत होने की विधि बताते हैं ताकि आप जान सके कि सिर्फ मनुष्य ही नहीं वरन पृथ्वी, सौर मंडल से लेकर पूरी सृष्टि एक ही विराट का अंग है। और वे मनुष्य की क्षमता के प्रयोग से मनुष्य के धर्म को विस्तृत कर सकने का मार्ग बताते हैं।

अलग अलग कालखण्ड पर धरती के अलग अलग हिस्सों पर जन्मे ये लोग अपने अपने अनुभवों को अपनी अपनी भाषा मे बताते हैं। कृष्ण हो या बुद्ध, महावीर हों या मोहम्मद, ये सब अलग अलग तरह की जनता से वार्तालाप करते हैं। ज़ाहिर है एक ही अनुभव से गुजरे ये लोग एक ही अनुभव को अलग अलग तरीको से लोगो को बताते हैं। और इसका नतीजा यह होता है कि उस एक अनुभव तक पहुंचने के, मनुष्य के उस एक विकसित धर्म तक की यात्रा के भिन्न भिन्न मार्ग तैयार हो जाते हैं।

यही भिन्न भिन्न मार्ग आज हिन्दू-इस्लाम-बौद्ध-सिख-जैन-पारसी-यहूदी आदि नामों से जाने जाते हैं। इसलिए इन्हें धर्म कहना सर्वथा गलत है। ये धर्म नहीं है। मनुष्यों का एक ही धर्म हो सकता है और धर्म एक ही है। उस धर्म की शिक्षा देने की पद्धतियां, भाषा, तरीके अलग अलग हो सकते हैं। उस लक्ष्य तक पहुंचने के मार्ग अलग अलग हो सकते हैं। इसलिये ये सब मार्ग मात्र हैं, ये सब पंथ मात्र है। धर्म नहीं। धर्म तो मनुष्य का एक ही है।

मनुष्य का धर्म है बहुआयामी विकास... आत्मिक, जैविक, बौद्धिक, भौतिक विकास। मनुष्य का धर्म है प्रेम, करुणा का मार्ग। मनुष्य का धर्म है स्व एवं सृष्टि के बीच के तादाम्य का अनुभव।

Comments

  1. आपके लेख के शब्द एवं भावना वास्तव में धर्म की आदर्श अवधारणा को विस्तार दे रहा है.. यहाँ मेरे मन में इस सन्दर्भ में एक विचार आ रहा है आप से साझा कर रहा हूँ.. मेरी समझ से सभी जीवित प्राणियों में उनका एक मूल स्वभाव होता है और वो है अपनी सीमा क्षेत्र में अपने वर्चस्व या नियंत्रण का.. आप ने कई प्राणियों में ऐसा देखा होगा.. शेर, बंदर और ऐसे ही कई प्राणियों का ऐसा ही मूल स्वभाव होता है और वास्तव में मनुष्य का भी ऐसा ही है.. लेकिन क्योंकि मानव का मस्तिष्क सभी प्राणियों से उन्नत है इसलिए उससे जुड़े प्रत्येक क्षेत्र में भिन्न भिन्न रूप मिलते हैँ अपनी अपनी अधिकार या भिन्नता प्रदर्शित करने के जिनको वैचारिक दृष्टि से कोई भी नाम हम आप दें.. !

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    1. वर्चस्व या नियंत्रण का भाव नहीं बल्कि वह कठिन परिस्थितियों में स्वयं का अस्तित्व बनाये रखने की आवश्यकता है, अन्यथा उनका जीवन खत्म हो सकता है। वर्चस्व अथवा नियंत्रण का भाव एक मानवीय कामना है, यह किसी प्राणी का मूल स्वभाव नहीं है।

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