रंगों की माया
जिस दुनिया में रंग न हो, जहाँ मकान तक पानी या कांच जैसे दिखे, जहाँ कपड़े भी आर पार दिखे तो हमारी वर्तमान दुनिया के आधे कार्य तो ऐसे ही व्यर्थ हो जाएंगे। जैसे फैशन के लिए होने वाले सारे काम व्यर्थ। चाहे कपड़े हो या मकानों का एक्स्टीरियर/इंटीरियर, सुरक्षा के लिए उनका उपयोग होगा लेकिन सिर्फ देखने के लिये कोई उपयोग नहीं। वास्तव में दृष्टि पर निर्भर पूरा बाज़ार ख़त्म हो जायेगा। क्योंकि जीवन की सारी दृश्य-सुन्दरता रंगों के कारण ही है। ये मेरे कपड़े, मेरे बेड की चादर, दीवारे, वार्डरोब, ये मेज, ये कुर्सी सभी कुछ रंगहीन हो जाय तो... मै कपड़े क्यों पहनूंगा, बेड पर चादर क्यों डालूँगा, वार्डरोब की क्या आवश्यकता होगी? यदि सभी कुछ पारदर्शी हो जाय तो मनुष्य की निजता से जुड़े सारे व्यवसाय बन्द हो जायेंगे।
रंगों पर हमारी निर्भरता हमारी सोच से कहीं ज्यादा विस्तृत है। रंग न हो तो रंग-सन्देश (सिग्नल) व्यवस्था का विकल्प तलाशना होगा। धर्मिक संगठन से लेकर संयुक्त राष्ट्र तक के झंडो का क्या होगा। दुनिया भर की कंपनियों के Logo और ट्रेडमार्क का क्या होगा। तस्वीरों की तो अवधारणा ही नहीं रहेगी। लिखना पढना कैसे होगा। क्योंकि इन सब व्यवस्थाओं में रंगभेद की सहायता है। संभवतः रंगभेद इतना भी बुरा नहीं जितना अधिकांश लोग समझते हैं। एक बात तो स्पष्ट है कि रंग भौतिक व्यवस्थाओं का मूल आधार है, रंगों के बिना भौतिक दुनिया का अस्तित्व नहीं हो सकता।
दुनिया के हजारों रंग अपने मूल में मात्र तीन हैं। इन्हीं तीन मूल से समस्त रंग निर्मित होते हैं। कला और चित्रकारी की दुनिया में ये तीन रंग हैं लाल, नीला और पीला। आधुनिक प्रिंटिंग तकनीक भी तीन रंगों से समस्त रंग निर्मित कर लेती है। कम्प्यूटर जगत में मूल रंगों के दो मॉडल प्रचलित है। एक है RGB अर्थात Red-Green-Blue। इन तीनों का मिश्रण सफ़ेद रंग निर्मित करता है। यह मॉडल additive कहलाता है। इसमें शून्य प्रकाश में प्रकाश के अंगों को जोड़ जोड़ कर पूर्ण प्रकाश अर्थात सफ़ेद तक पहुँचते हैं। दूसरा है CMYK मॉडल अर्थात Cyan-Magenta-Yellow। इन तीनों का मिश्रण काला रंग निर्मित करता है। K का तात्पर्य यहाँ Key से है जो काले के लिए प्रयुक्त होता है। यह मॉडल substractive कहलाता है। इसमें पूर्ण प्रकाश से प्रकाश के अंगों को कम करते करते शून्य प्रकाश अर्थात काले रंग तक पहुँचते हैं। दोनों ही मॉडल तीन मूल रंगो पर निर्भर है। अन्तर सिर्फ इतना है कि एक काले से सफ़ेद की ओर चलता है दूसरा सफ़ेद से काले की ओर। प्रिन्टिंग में CMYK मॉडल प्रयुक्त होता है क्योंकि वहां आधार सफ़ेद है और काला रंग प्रिंट करना है। यहाँ पर रंग प्रकाश-अवशोषण का परिणाम है। इसके उलट टीवी, कम्प्यूटर, मोबाइल स्क्रीन पर प्रकाश अवशोषित नहीं होता। वहां प्रकाश अन्दर से बाहर फेका जाता है। वहां आधार शून्य प्रकाश अर्थात काली स्क्रीन है, वहां पूर्ण प्रकाश चाहिए जो RGB के मिश्रण से निर्मित होता है। वहां काले रंग के लिए प्रकाश की अनुपस्थिति को प्रयुक्त किया जाता है। भिन्न भिन्न उपयोगों के लिए भिन्न भिन्न रंगों को मूल रंग के रूप में प्रयोग किया जा सकता है लेकिन मूल रंगों की कुल संख्या सदैव तीन ही होगी।
कभी आपने कल्पना की है कि रंगों की कुल संख्या कितनी हो सकती है? रंगों की संख्या अनन्त है। एक वैज्ञानिक अवधारणा के अनुसार यह 18 डिसिलियन तक हो सकती है! अर्थात 18 के बाद 33 शून्य। इतनी बड़ी संख्या के लिए अनन्त शब्द ही उपयुक्त है। आधुनिक कम्प्यूटर लगभग 16 मिलियन तक रंग प्रदर्शित कर सकने में सक्षम हैं। कंप्यूटर अपने प्रत्येक मूल रंग जैसे RGB तकनीक के अंतर्गत लाल, नीले और हरे के 0-255 भेद करता है। इन सभी भेदों के भिन्न भिन्न मिश्रण से कुल 1,65,81,375 प्रकार के रंग निर्मित हो सकते हैं। इनमें से अभी तक 1640 रंगों का नामकरण किया गया है।
रंगों को बेहतर समझने के लिए हमें प्रकाश की वेवलेंथ अर्थात तरंगदैर्घ्य को समझना होगा। मनुष्य द्वारा प्रकाश की 400 से 700 नैनो मीटर के वेवलेंथ ही देखी जा सकती है। समस्त रंग प्रकाश की अलग अलग वेव लेंथ के कारण दिखाई देते हैं। प्रत्येक वेवलेंथ पर परावर्तित होने वाला प्रकाश हमें अलग रंग का अनुभव कराता है। 400 नैनोमीटर के समीप किन्तु उससे कम वेवलेंथ का प्रकाश अल्ट्रावायलेट कहलाता है और 700 के समीप और उससे ऊपर यह इन्फ्रारेड कहलाता है। अल्ट्रावायलेट और इन्फ्रारेड की तरह अन्य वेवलेंथ पर पाई जाने वाली एक्स रेज़, गामा रेज़, माइक्रो वेव्स, रेडियो वेव्स भी होती हैं जो कि मनुष्यों की दृश्य क्षमता से बाहर होती है। मनुष्य की दृश्य क्षमता 400 से 700 नैनोमीटर वेवलेंथ अर्थात प्रकाश की है।
सूर्य का जो प्रकाश हमें इन्द्रधनुष या प्रिज्म के माध्यम से सात रंगों में विभक्त होकर दिखता है वह भी अपने मूल में तीन रंगों से निर्मित है। यह अनायास ही है कि भौतिक सृष्टि का चक्र भी तीन तरह की ऊर्जाओं से संतुलित होता है। जन्म, धारण एवं विघटन। जिसे भारतीय चिन्तन में ब्रम्हा, विष्णु और महेश का नाम दिया गया हो। कौन जाने कल कोई वैज्ञानिक पता लगा ले कि रंग अर्थात सम्पूर्ण श्वेत प्रकाश के तीन मूल अंग भी कुल प्राकृतिक शक्ति की इन्ही तीन आयामों के द्योतक हैं।
रंगों की उपयोगिता विज्ञान तक ही सीमित नहीं, बल्कि मानव व्यवहार के विज्ञान तक विस्तृत है। प्रत्येक रंग मानव के अलग व्यवहार को परिलक्षित करता है। जैसे लाल रंग गुस्सा, सफ़ेद रंग शांति, हरा रंग सम्पन्नता, गुलाबी रंग प्रेम आदि आदि। भारतीय चिन्तन ने मानव जीवन में रंगों को इतना महत्व दिया है कि एक त्योहार ही रंगों पर निर्मित कर दिया। भौतिक जीवन में रंगों की प्रचुरता उल्लास और उत्सव का द्योतक है। उत्सव और रंग का चोली दामन का साथ है। जब भी हम उल्लास से भरते है, जब भी हमारा चित्त उत्सवी हो उठता है, हम चारो ओर का वातावरण रंगों से भर देना चाहते हैं। होली ही नहीं दीपावली में भी रंग बिखरते हैं। कहीं रंगीन रोशनी के रूप में तो कहीं रंगोली के रूप में। धरती के हर हिस्से की मानव जाति ने उत्सवों में रंगों को शामिल किया है। मानव जीवन से रंगों का सम्बन्ध इतना गहन है कि हमने रंगों के नाम से मानव व्यवहार के तमाम मुहावरे भी बन गए हैं। जैसे शर्म से लाल होना, गुस्से में लाल पीला होना, तबियत हरी होना, रंग उड़ जाना, रंग जमाना, रंग चढ़ना, रंग निखरना, रंग में भंग पड़ना, सफ़ेद झूठ, गिरगिट की तरह रंग बदलना आदि। रंग और व्यवहार की बात में गिरगिट बड़ा प्रासंगिक है।
वैज्ञानिकों के अनुसार गिरगिट की त्वचा में पिगमेंट कोशिकाओं के नीचे 'फोटोनिक क्रिस्टल' की परत होती है जो प्रकाश को भिन्न भिन्न प्रकार से परावर्तित करने की क्षमता रखती है। गिरगिट अपने आस पास के रंग के आधार पर इन फोटोनिक क्रिस्टल की मदद से प्रकाश परावर्तन को नियंत्रित कर रंग बदल लेता है। यहाँ एक बात तो स्पष्ट है कि एक नन्हे से जीव होने के बावजूद गिरगिट को रंगों की अच्छी समझ है, वह न सिर्फ अपने आस पास का रंग पहचानता है बल्कि अपनी त्वचा को भी उसी रंग के अनुसार प्रकाश परावर्तन का निर्देश भी दे देता है।
लेकिन रंगों के मामले में सभी जीव गिरगिट जितने सक्षम नहीं होते। लम्बे समय तक वैज्ञानिकों ने जानवरों और रंगों को लेकर बड़े प्रयोग किये। वैज्ञानिकों के अनुसार कुत्ते, बिल्ली, मछली कोई रंग नहीं पहचान पाते। संभवतः इनकी नज़र में दुनिया लगभग श्वेत-श्याम या कहिये प्रकाश-छाया तक सीमित है। गाय, बैल, गधे जैसे पशुओं को ये दुनिया मटमैली या खाकी जैसी दिखती है। वे सफ़ेद रंग को जरूर पहचान सकते हैं। लाल रंग से सांड के भड़कने की बात एकदम अवैज्ञानिक है क्योंकि वह लाल रंग नहीं पहचानता। उसके लिए लाल, नीले, हरे सब समान है। वैज्ञानिकों के अनुसार सांड लाल रंग नहीं बल्कि कपड़े को हवा में लहराने के अंदाज से भड़कता है। बन्दर उन जानवरों में से है जो रंगों को पहचान सकते हैं। पक्षियों के बारे में वैज्ञानिकों का मानना है कि वे रंगों को पहचानने के मामले में मनुष्यों से ज्यादा समझ रखते हैं। शायद यहाँ रंगों और उड़ान का कोई सम्बन्ध है क्योंकि "मनुष्यों की दुनिया में भी जो जितने ज्यादा रंग पहचानना जानता है वह भी उतनी ही उड़ान भर पाता है।"
रंग क्यों हैं? रंग के इतने भेद कैसे है? क्यों किसी वस्तु का एक विशिष्ट रंग दिखाई देता है? इसके लिए पहले मानव आँख की विशेषता समझिये। मानव की आँख में तीन प्रकार की कोन सेल्स हैं जो प्रकाश के प्रत्येक कण को पकडती है। तीनों सेल एक प्रकाश के एक विशेष अंग अर्थात रंग को ही पकड़ पाती हैं । अर्थात तीनों सेल्स की अलग अलग वेवलेंथ के प्रकाश को पकड़ पाने की क्षमता है। एक कोन सेल लाल रंग, दूसरी हरा रंग और तीसरी नीला रंग। तीनों कोन सेल्स एक साथ एक ही प्रकाश के अलग अलग अंग को पकड़कर मष्तिष्क को तरंगे भेजती हैं जिससे मस्तिष्क रंग निर्धारित करता है।
विज्ञान के अनुसार कोई भी वस्तु हमें इसलिए दिखती है क्योंकि उस पर प्रकाश की किरण पड़ कर वापस परावर्तित होती है। यदि प्रकाश न हो, या प्रकाश वस्तु पर पड़कर वापस परावर्तित न हो तो हमारी आँखों पर कोई प्रतिबिम्ब नहीं बनता और वह वस्तु होकर भी हमें नहीं दिखती। जैसे कांच। कांच पर प्रकाश पड़कर वापस नहीं आता वह उसके पार निकल जाता है। तभी तो हम कांच से टकरा जाते हैं। कांच के एकदम समीप होने के बावजूद भी हमारी आंख उसे पकड़ने में चूक जाती है। इसी तरह एकदम काले रंग की वस्तु से भी आप टकरा सकते हैं, वहां भी आपकी आँखों में कोई प्रतिबिम्ब नहीं बनता। प्रकाश का न होना अथवा प्रकाश का गिरकर वापस न आना हमारे लिए वस्तु को उपस्थित होने के बावजूद अनुपस्थित कर सकता है। वह दृष्टि क्षेत्र हमारे लिए अंधकार अर्थात काला बनकर रह जाता है
काले रंग और अन्धकार के रंग के पीछे एक ही विज्ञान है। अन्धकार अर्थात प्रकाश की अनुपस्थिति। प्रकाश में सभी रंग उपलब्ध हैं एकमात्र काले को छोड़कर। सृष्टि के सभी रंग मिलकर प्रकाश निर्मित करते हैं। यदि किसी वस्तु पर प्रकाश गिरकर वापस नहीं आता तो वह वस्तु भी हमें अंधकार की भांति काली दिखाई देती है। क्योंकि प्रकाश के सभी रंग वहां अवशोषित हो जाते हैं। इसलिए काला कोई रंग नहीं वस्तुतः प्रकाश की अनुपस्थिति है। इसके विपरीत जहाँ भी कोई रंग दिखाई दे तो इसका अर्थ है वहां प्रकाश की उपस्थिति है। रंग वस्तुतः प्रकाश ही है।
वास्तव में सृष्टि का प्रत्येक रंग प्रकाश की किरण का अंश मात्र है। हम जो भी वस्तु देखते हैं वह उस विशिष्ट रंग की इसीलिए दिखाई देती है क्योंकि वह वस्तु प्रकाश के सभी रंग सोख लेती है और जिस रंग को नहीं सोख पाती उसे वापस परावर्तित कर देती है अर्थात वापस फेक देती है। वही वापस फेका गया प्रकाश का अंश ही उसका रंग कहलाता है। उदहारण के लिए पौधे की पत्ते हमें हरे रंग की दिखाई देती है क्योंकि उसने प्रकाश के अन्य सारे रंग सोख लिए लेकिन हरे रंग को नहीं सोख पाई और वापस फेक दिया। इसी कारण हमें वह हरी दिखाई देती है।
हमारे सारे रंगों की मान्यता हमारे देखने के आयाम के सापेक्ष हैं। यदि आयाम हमारे देखने की बजाय वस्तु के रंग सोखने का होता तो वस्तुओं के रंगों के नाम ठीक विपरीत होते। उदहारण के लिए वास्तव में पौधे के पत्ते ने प्रकाश के सभी रंग धारण कर रखे हैं सिवाय हरे के। हरा रंग पत्ते ने वापस फेक दिया इसीलिए वह हमें हरा दिख रहा है, शेष सभी रंग पत्ते ने अपने पास रख लिए। तो क्या पत्ता वास्तव में हरा है या हरे के अतिरिक्त अन्य सभी कुछ। पत्ता हमें हरा दिखाई दे रहा है लेकिन वास्तव में वह हरा है नहीं। उसका रंग हरे के अतिरिक्त सभी कुछ है। ये एक अलग आयाम, एक अलग दृष्टिकोण की बात है। देखने के दृष्टिकोण की बजाय ‘होने’ का दृष्टिकोण अपनाएं तो प्रत्येक वस्तु का रंग वह सभी है जो दिखाई नहीं देता है। किसी भी वस्तु के पास वह रंग नहीं है जो दिखाई देता हैं।
वास्तविकता में इस दुनिया में किसी भी वस्तु का कोई रंग है ही नहीं। बस प्रत्येक वस्तु की अपनी प्रकाश सोखने की क्षमता है। जिस वस्तु की जैसी क्षमता, उसी के अनुसार दिखाई देती है। रंग एक आभास मात्र है। रंग एक माया है। रंग का अस्तित्व नहीं है। अस्तित्व प्रकाश का है।
भौतिक वस्तुओं से परावर्तित हो रहे प्रकाश की सहायता से मस्तिष्क में एक छवि बन जाती है (ठीक कैमरे की तरह) लेकिन सीधे सीधे प्रकाश को भी कभी देखा नहीं जा सकता। प्रकाश को पकड़ने के लिए कुछ भौतिक चाहिए। शून्य में यदि प्रकाश उपस्थित भी हो तो उसे हमारी आँख नहीं पकड़ सकती। शून्य में प्रकाश और अन्धकार में कोई भेद नहीं। सारा भेद भौतिक जगत में है।




यह लेख साहित्यिक तथा वैज्ञानिक ....दोनो ही के मापदंडों में अच्छा है,परंतु इस विषय पर मेरे मन में अन्य कई विचार जन्म लेते हैं।रंग मनुष्य के विचारों तथा अनुभवों को प्रभावित करते हैं, जैसे खाने का स्वाद...यहां तक कि औषधियों का प्रभाव भी,जिसे 'प्लेसबोस इफ़ेक्ट' कहते हैं।हमारी पांच ज्ञानेन्द्रियों में से एक..हमारी आंखें...एक तौर पर रंगों पर आधारित हैं तथा उनके बिना निरर्थक भी। तो क्या रंगों का न होना अन्य 4 ज्ञानेंद्रियों को प्रभावित नहीं करेगा?
ReplyDeleteइन्द्रियां ऊर्जाओं के अलग अलग आयामों को ग्रहण कर मस्तिष्क के माध्यम से उन्हें अलग अलग वर्गों में विश्लेषित करती है। एक ही ऊर्जा के अलग अलग भेद हमें भौतिक वस्तुओं (Mass) को विश्लेषित करने में मदद करते हैं। आँख प्रकाश ऊर्जा में, कान ध्वनि ऊर्जा में, स्पर्शेन्द्रिय तापमान में, नाक गन्ध में और जीभ स्वाद में भेद करती है। प्लेसबो इफ़ेक्ट का सम्बन्ध इन्द्रियों से कम मन से ज्यादा है। मन (भौतिक शरीर) और शरीर (स्थूल शरीर) की क्रियाएं एक दूसरे को गहरे प्रभावित करती है। प्लेसबो एक तरह से मन को राजी करने का तरीका है जो परिणामस्वरूप शरीर पर भी प्रभाव छोड़ता है।
Deleteयदि हमारी कोई एक इन्द्रिय काम ना करे तो उसका प्रभाव मात्र इतना है कि एक ओर हम उस इन्द्रिय सम्बन्धी ऊर्जा के आयाम को ग्रहण और विश्लेषित नहीं कर पाएंगे और दूसरा, उस इन्द्रिय में व्यय होने वाली हमारी ऊर्जा अब दूसरी इन्द्रियों की ओर बहने लगेगी। रंगों का न होने की कल्पना दृष्टि के ना होने से भी की जा सकती है। दृष्टिहीन व्यक्ति के लिए कोई रंग नहीं होता। लेकिन इससे उसकी कोई अन्य इन्द्रिय प्रभावित नहीं होती। हाँ दृष्टिबाधितों की अन्य इन्द्रियां ज्यादा प्रबल हो जाती है क्योंकि हमारी सारी इन्द्रियों में आँख का प्रयोग सबसे ज्यादा है। वहां से व्यय होने वाली ऊर्जा बड़ी मात्रा में अन्य इन्द्रियों में जब संलग्न हो जाती है तो उनकी अन्य इन्द्रियां ज्यादा संवेदनशील हो उठती है।
बहुत सुंदर अभिव्यक्ति ।
ReplyDeleteAti sunder ati gyan wardhak
ReplyDeletePerfect presentation
ReplyDeleteआपका लेख गूढ़ अध्ययन का प्रतीक प्रदर्शित करता है। बेहद ज्ञानवर्धक, आत्मिक, और प्रकृति के रहस्यों को उजागर करता है। आपके ज्ञान और खोज को प्रतिबिंबित करता है।
ReplyDeleteआज के युग में जब दुनिया भाग रही है, तब ये पाठक के लिए बड़ी चुनौती है कि वो कितना धैर्य बना सकता है आपके लेख के ज्ञान को प्राप्त करने में।
अद्भुत, ज्ञानवर्धक, प्रकृति दार्शनिक।
पाठन और ज्ञान के लिए धैर्य के महत्व को इंगित करने के लिए धन्यवाद्
Deleteबहुत सुंदर अभिव्यक्ति
ReplyDelete"सभी कुछ कांच सा साफ़। आर पार दिखने वाला।"
ReplyDeleteजैसा कि आपने लिखा कि रंग तो है ही नही, ये तो आंखों की खूबी है जो हम कुछ वेवलेंथ को देख सकते है और यदि वो भी ना कर सके तो हाँ तब हमारे लिए सृष्टि रंगविहीन होती। और तब कुछ दिखता ही नही। सिर्फ अंधकार। इस अंधकार को भी हम कैसे कह सकते है? क्योकि काला भी तब है जब पूर्ण रूप से प्रकाश को सोखा जा सके और अगर ये भी ना हो तब क्या ? ये समझ से परे है।
"प्रत्येक रंग मानव के अलग व्यवहार को परिलक्षित करता है।"
मेरी नज़र में रंग मानव का व्यवहार नही बल्कि मानव ने इन रंगों को अपने व्यवहार से जोड़ा है। जैसे लाल रंग सिर्फ क्रोध नही और ना ही हिंसा बल्कि खूबसूरती की भी निशानी है।
जी बिल्कुल ठीक कहा आपने।
Deleteबहुत सुंदर। ज्ञान वर्धक 💐🙏
ReplyDeleteSuperb gyan vardhak
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